Sunday, October 13, 2013

येसा तो ना था



बारिश का सीजन आशिकी का सीजन, प्रेमीजन शहर में ठिकाने ढूंढते हैं- बात तो कर ही लें कायदे से। दिल्ली इस हिसाब से बहुत ठिकानाहीन शहर है। मुंबई में समंदर किनारे थोड़ी राहत नसीब हो जाती है, प्रेमीजनों को। दिल्ली में चोरों के सैलाब, डाकुओं के तूफान हैं, बस पानी का समंदर नहीं है। दिल्ली के नौजवान वोटरों का सही-सेट हिसाब लग जाए, तो नेतागण यह भी प्रॉमिस कर देंगे नौजवानों से कि बहुत जल्दी समंदर ले आया जाएगा दिल्ली में। दिल्ली में प्रेम-संवाद बहुतै महंगा है। गरीब तो दूर, मध्यवर्गीय प्रेमी ठीकठाक से रेस्त्रां में तीन घंटे बैठने के बाद जेब में इत्ता बड़ा छेद महसूस करते हैं कि सोचते हैं कि हाय ना मिलते, तो बेहतर था, दिल पे तब जितना बड़ा छेद होता, वह जेब के छेद के मुकाबले बहुतै छोटा होता। दिल्ली में प्रेम धीमे-धीमे आलू, टमाटर जैसा होता जा रहा है, भ्रष्टाचारी ही अफोर्ड कर पाएंगे। प्रेमियों और भ्रष्टजनों में एक और खास समानता दिख रही है- दोनों ही सीसीटीवी कैमरों से खौफ खाते हैं। भ्रष्टों का अलबत्ता सीसीटीवी कैमरे कुछ ना बिगाड़ पाते, प्रेमीजनों का बिगड़ जाता है। मेट्रो में सफर करने वाले कई नौजवानों-युवतियों को जानने-मिलने वालों के इस खामोश सवाल का सामना करना पड़ा है कि हाय वो मेट्रो के सीसीटीवी कैमरे में प्रेमरत तुम ही तो ना थे। प्रेमियों को कई जवाब देने पड़ते हैं।
बारिश में कई प्रेमीजन निराश-परेशान घूम रहे हैं। मैंने सुझाव दिया है कि मेट्रो में अब तुम मुखौटे पहनकर जाया करो, बालक टॉम का पहन ले, बालिका जेरी का पहन ले। सीसीटीवी फुटेज देखकर लोग हैरान होंगे कि हाय बिल्ली चूहे को प्यार कैसे कर रही है। इश्क में सब कुछ संभव है, अपार संभावनाएं हैं इश्क में.
editorial

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