Monday, July 22, 2013

गुरु पूर्णिमा पर विशेष

  आप सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभ कामनाये !!!



             आप सभी निचे दिए Link पर click कर post जरुर पढ़े ........
             ---->>>>>> गुरु की महत्ता 

हमारे माता-पिता



माता-पिता की सेवा करना,
उन पर कोई एहसान नहीं !

माता-पिता के चरणों से बढ़कर,
दूजा कोई धाम नहीं !

इनके चरणों को छु लेने भर से,
चार धाम  तीरथ हो जाये !

माता-पिता का आशीष लगे तो,
बच्चे भव सागर से तर जाये !

माता-पिता जायदाद है येसी,
जिसका कोई दाम नहीं !

माता-पिता अनमोल हमारे,
इनका दुनिया में कोई मोल नहीं !

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Saturday, July 20, 2013

जीवन के स्रोत



पिने के लिए कोई चीज है तो    -   क्रोध 
खाने के लिए कोई चीज है तो    -   गम 
लेने के लिए कोई चीज है तो     -   ज्ञान 
देने के लिए कोई चीज है तो      -   दान 
कहने के लिए कोई चीज है तो   -   सत्य 
दिखाने के लिए कोई चीज है तो -   दया 
त्याग के लिए कोई चीज है तो   -   ईष्या 
परखने के लिए कोई चीज है तो -   बुध्दि
रखने के लिए कोई चीज है तो   -    मान 
संग्रह के लिए कोई चीज है तो   -    विद्या 
सफलता के लिए कोई चीज है तो-  प्रसन्नता 
जितने के लिए कोई चीज है तो   -  मन 


अगर आप की कलम भी कुछ कहती है तो आप भी अपने लेख हमे भेज सकते है ! हमारा Email id - bindasspost.in@gmail.com 

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"जय हिन्द जय भारत''   

Thursday, July 18, 2013

Mobile से जुड़ी कुछ जानकारिया


मोबाइल से जुडी कई ऐसी बातें जिनके
बारे में हमें जानकारी नहीं होती लेकिनमुसीबत के वक्त यह मददगार साबितहोती है ।

इमरजेंसी नंबर ---दुनिया भर में मोबाइल
का इमरजेंसी नंबर 112 है । अगर आप
मोबाइल की कवरेज एरिया से बाहर हैं
तो 112 नंबर द्वारा आप उस क्षेत्र के
नेटवर्क को सर्च कर लें . ख़ास बात यह
है कि यह नंबर तब भी काम करता है जब आपका कीपैड लौक हो !

जान अभी बाकी है---मोबाइल जब
बैटरी लो दिखाए और उस दौरान
जरूरी कॉल करनी हो , ऐसे में आप *3370# डायल करें , आपका मोबाइल फिर से चालू हो जायेगा और आपका सेलफोन बैटरी में 50 प्रतिशत का इजाफा दिखायेगा !

मोबाइल का यह रिजर्व दोबारा चार्ज
हो जायेगा जब आप अगली बार
मोबाइल को हमेशा की तरह चार्ज करेंगे !

मोबाइल चोरी होने पर-मोबाइल फोन
चोरी होने की स्थिति में सबसे पहले जरूरत होती है , फोन को निष्क्रिय करने
की ताकि चोर उसका दुरुपयोग न कर सके
। अपने फोन के सीरियल नंबर को चेक करने के लिए *#06# दबाएँ . इसे दबाते
हीं आपकी स्क्रीन पर 15 डिजिट
का कोड नंबर आयेगा . इसे नोट कर लें और किसी सुरक्षित स्थान पर रखें . जब
आपका फोन खो जाए उस दौरान अपने
सर्विस प्रोवाइडर को ये कोड देंगे तो वह
आपके हैण्ड सेट को ब्लोक कर देगा !

कार की चाभी खोने पर -अगर
आपकी कार की रिमोट केलेस इंट्री है और गलती से आपकी चाभी कार में बंद रह
गयी है और दूसरी चाभी घर पर है
तो आपका मोबाइल काम आ सकता है !

घर में किसी व्यक्ति के मोबाइल फोन पर
कॉल करें ! घर में बैठे व्यक्ति से कहें कि वह
अपने मोबाइल को होल्ड रखकर कार की चाभी के पास ले जाएँ और चाभी के
अनलॉक बटन को दबाये साथ ही आप
अपने मोबाइल फोन को कार के दरवाजे
के पास रखें , दरवाजा खुल जायेगा ! 

Tuesday, July 16, 2013

मन देख के रोता है

मन देख के रोता है हुआ ये जो तमाशा है
हुई तार तार देखो जन जन की आशा है !!

बच्चे कितने दुधमुहे चिल्लाते हैं,
माता के आँसू झरझर बहे जाते हैं,
मृत्यु को मांगते हैं भूख के डर से,
शासन का देखो क्या गज़ब तमाशा है !!

मन देख के रोता है हुआ ये जो तमाशा है,
हुई तार तार देखो जन जन की आशा है !!

वादों पर वादे हैं इन सत्ताखोरों के,
गाल बजाने में इनका क्या जाता है,
घर अपने बनाते ये मदद की राशि से,
रहम जरा भी न पीड़ितों पर आता है !!

मन देख के रोता है हुआ ये जो तमाशा है,
हुई तार तार देखो जन जन की आशा है !!

लाचार हुई देखो ममता चिल्लाती है,
बेबस होकर माँ इन्हें घास खिलाती है,
मानवता घायल हो आँसू बहाती है,
जीने का विश्वास इनका उठता जाता है !!

मन देख के रोता है हुआ ये जो तमाशा है,
हुई तार तार देखो जन जन की आशा है !!

इन दुखियों पर क्यों रहम न आता है,
धरती का सीना क्यों फट नहीं जाता है,
भोजन का ग्रास मेरे नहीं मुख में जाता है,
हमसे ही इनकी देखो कितनी आशा है !!

मन देख के रोता है हुआ ये जो तमाशा है,
हुई तार तार देखो जन जन की आशा है !!

प्रकृति कराहती है बादल भी रोते हैं,
क्या करें पीड़ित न समझ में आता है,
आयें आगे मिलकर सब जन भारत के,
मानवता की सबसे इनको आशा है !!

मन देख के रोता है हुआ ये जो तमाशा है हुई,
तार तार देखो जन जन की आशा है !!

Saturday, July 13, 2013

मुंबई पुलिस का मनोबल चूर-चूर करने की योजना


११ अगस्त को आज़ाद मैदान में हुई "सुनियोजित हिंसा" के विरोध में मुंबई पुलिस की महिला उपनिरीक्षक सुजाता पाटिल द्वारा, पुलिस विभाग की एक पत्रिका में प्रकाशित एक कविता के खिलाफ "समाजसेवियों"(?) के एक समूह और "महेश भट्ट जैसे" सेकुलरों(?) ने हाईकोर्ट में जाने का फैसला किया है. 

इन "समाजसेवियों"(?) का कहना है कि एक पुलिस अधिकारी को इस तरह की भाषा का उपयोग नहीं करना चाहिए. एक एडवोकेट एजाज़ नकवी ने इस कविता की तुलना ओवैसी के भाषण से की है और पुलिस कमिश्नर से सुजाता पाटिल को बर्खास्त करने की मांग की है.



हम ना समझे थे बात इतनी सी थी,
लाठी हाथ में थी, पिस्तौल कमर पे थी,
गाड़िया फुकी थी, आँखे नशीली थी,
धक्का देते उनको, तो ओ भी जलते थे,
हम ना समझे थे बात इतनी सी  !!

होसला बुलंद था, इज्जत लुट रही थी,
गिराते एक-एक को, क्या जरूरत थी इशारों की,
हम ना समझे थे बात इतनी सी  !!

हिम्मत की गद्दारों ने, अमर ज्योति हाथ लगाने की,
काट देते उनके हाथ तो फरियाद किसी की भी ना होती,
हम ना समझे थे बात इतनी सी  !!

भूल गये ओ रमजान, भूल गये ओ इंसानियत,
घाट उतार देते एक-एक को,
अरे क्या जरूरत थी किसी को डरने की,
संगीन लाठी तो आपके ही हाथ में थी,
हम ना समझे थे बात इतनी सी  !!

हमला तो हमपे था, जनता देख रही थी,
खेलते गोलियों की होली तो,
जरूरत ना पड़ती, नवरात्रि में रावण जलाने की,
रमजान के साथ-साथ, दिवाली भी होती,
हम ना समझे थे बात इतनी सी  !!

सांप को दूध पिलाकर,
बात करते है हम भाई चारे की,
ख्वाब अमर जवानो के,
और जनता भी डरी-डरी सी,
हम ना समझे थे बात इतनी सी  !! 
--->> by- सुजाता पाटील  
पुलिस निरीक्षक,
मुंबई 


इस कविता को पढ़कर आप स्वयं समझ गए होंगे कि आज़ाद मैदान की घटना के बाद पुलिस फ़ोर्स के मनोबल में कितनी गिरावट हुई है और पुलिसकर्मी अपने हाथ बंधे होने की वजह से कितने गुस्से और निराशा में हैं. 

उल्लेखनीय है कि ११ अगस्त को आज़ाद मैदान में मुल्लों के हिंसक प्रदर्शन के दौरान कई पुलिसकर्मी घायल किये गए, कुछ महिला कांस्टेबलों के साथ छेड़छाड़ और बदसलूकी की गई, शहीद स्मारक को तोडा-मरोड़ा गया. पुलिस के पास पर्याप्त बल था, हथियार थे, डंडे थे... सब कुछ था लेकिन मुल्लों की उस पागल भीड़ पर काबू पाने के आदेश नहीं थे. पुलिस वाले पिटते रहे, अधिकारी चुप्पी साधे रहे और कांग्रेस की सरकार मुस्लिम वोटों की फसल पर नज़र रखे हुए थी. 

जैसा कि सभी जानते हैं इसी घटना के एक आरोपी को पकड़ने के लिए जब मुम्बई पुलिस बिहार से एक मुल्ले को उठा लाई थी, तो नीतीश ने हंगामा खड़ा कर दिया था, क्योंकि बात वहां भी वही थी... यानी "मुस्लिम वोट". पुलिस बल कितना हताश और आक्रोश से भरा हुआ है इसका सबूत इस बात से भी मिल जाता है कि जब राज ठाकरे ने आज़ाद मैदान की इस सुनियोजित हिंसा के खिलाफ जोरदार रैली निकाली थी, तब शिवाजी पार्क मैदान में एक कांस्टेबल ने खुलेआम मंच पर आकर राज ठाकरे को इसके लिए धन्यवाद ज्ञापन करते हुए, गुलाब का फूल भेंट किया था... 

इन "तथाकथित समाजसेवियों" का असली मकसद पुलिस का मनोबल एकदम चूर-चूर करना ही है. महेश भट्ट जैसे "ठरकी और पोर्न" बूढ़े, जिसका एकमात्र एजेंडा सिर्फ हिन्दुओं का विरोध करना ही है, वह अक्सर ऐसी मुहिम में सक्रीय रूप से पाया जाता है. यानी अब इनके अनुसार कोई महिला पुलिस अपनी "अन्तर्विभागीय पत्रिका" में अपनी मनमर्जी से कोई कविता भी नहीं लिख सकती, जबकि यही कथित समाजसेवी और मानवाधिकारवादी आए दिन "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" का झंडा लिए घूमते रहते हैं. 

कविता में आपने नोट किया होगा कि इसकी मूल पंक्ति है "हम न समझे थे बात इतनी सी..." यह पंक्तियाँ जैकी श्रोफ और अमरीश पुरी अभिनीत फिल्म "गर्दिश" के गीत की पंक्तियाँ हैं. उस फिल्म में एक ईमानदार पुलिस कांस्टेबल के मन की व्यथा, उसके साथ हुए अन्याय के बारे में बताया गया है. स्वाभाविक है कि सुजाता पाटिल के मन में भी आज़ाद मैदान की "सुनियोजित हिंसा" और बदसलूकी के खिलाफ गुस्सा, घृणा, हताशा के मिले-जुले भाव बने हुए हैं. इसलिए उनकी कलम से ऐसी मार्मिक कविता निकली है, जिसे पढ़कर तथाकथित सेकुलर, नकली समाजसेवी और फर्जी मानवाधिकारवादी जले-भुने बैठे हैं. जबकि यही मानवाधिकारवादी और समाजसेवी, उस समय मुंह में दही जमाकर बैठ जाते हैं, जब माओवादीएक पुलिसवाले के शव के पेट में उच्च शक्ति वाला बम लगा देते हैं... लानत है ऐसे समाजसेवियों पर. साथ ही हजार लानत है महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार पर जो "सेकुलरिज्म" के नाम पर मुस्लिम वोटरों को खुश करने के लिये आज़ाद मैदान हिंसा के तमाम आरोपियों में से इक्का-दुक्का को ही पकड़ने का दिखावा कर रही है., जबकि उस हिंसा के ढेर सारे वीडियो फुटेज उपलब्ध हैं, जिनसे उन तमाम उत्पाती मुल्लों को धर-दबोचा जा सकता है. 


इन कथित समाजसेवियों को सुजाता पाटिल द्वारा आज़ाद मैदान के दंगाइयों के लिए “देशद्रोही” और “सांप” शब्दों पर आपत्ति है, साथ ही महेश भट्ट को यह भी आपत्ति है कि पाटिल ने अपनी कविता में “गोलियों की होली” शब्द का उपयोग करके हिंसात्मक मनोवृत्ति का परिचय दिया है.

शायद ये समाजसेवी चाहते होंगे कि गृहमंत्री शिंदे की तरह इन “जुमेबाज” दंगाइयों को“श्री हाफ़िज़ सईद” कहा जाए? या फिर परम ज्ञानी भविष्यवक्ता दिग्विजय सिंह की तरह“ओसामा जी” कहा जाए, या फिर शायद ये लोग तीस्ता सीतलवाड़ जैसे पैसा खाऊNGOवादियों की तरह पुलिस के सिपाहियों के मुंह से, “माननीय सोहराबुद्दीन” कहलवाना चाहते हों... कांग्रेस और मानवाधिकारवादियों की ऐसी ही छिछोरी राजनीति, हम बाटला हाउस के शहीद श्री मोहनचंद्र के बारे में भी देख चुके हैं.

यह बात तो सर्वमान्य है कि माफिया हो या पुलिस, दोनों का काम उसी स्थिति में आसानी से चलता है, जब उनका “जलवा” (दबदबा) बरकरार रहे, और वर्तमान परिस्थिति में दुर्भाग्य से माफिया-गुंडों-दंगाइयों-असामाजिक तत्वों और दो कौड़ी के नेताओं का ही “दबदबा” समाज में कायम है, पुलिस के डंडे की धौंस तो लगभग समाप्त होती जा रही है. इसके पीछे का कारण यही “श्री हाफ़िज़ सईद” और “ओसामा जी” कहने की घटिया मानसिकता तथा मानवाधिकार के नाम पर रोटी सेंकने और बोटी खाने वाले संदिग्ध संगठन हैं... जबकि देश की इस विकट परिस्थिति में हमें सेना-अर्धसैनिक बल तथा पुलिस के निचले स्तर के सिपाही और इन्स्पेक्टर इत्यादि का मनोबल और धैर्य बढाने की जरूरत है, वर्ना ये बल सुजाता पाटिल और राज ठाकरे को फूल भेंट करने वाले कांस्टेबल की तरह अन्दर ही अन्दर घुटते रहेंगे और हताश होंगे, जो कि देश और समाज के लिए बहुत घातक होगा. 

इन कथित समाजसेवियों के खिलाफ एक सशक्त मुहीम चलाने की आवश्यकता है, साथ ही सुजाता पाटिल का मनोबल बढाने के लिए उसका साथ देने की जरूरत है. इन्स्पेक्टर सुजाता पाटिल तुम्हें सलाम... कि जो तुमने अपने दिल की बात खुल कर रखी.. हम तुम्हारे साथ हैं. 

सन्दर्भ :-  http://timesofindia.indiatimes.com/city/mumbai/Activists-to-move-high-court-over-cops-riot-poem/articleshow/18012301.cms

सुजाता पाटील द्वारा लिखी गयी कविता

हम ना समझे थे बात इतनी सी थी,
लाठी हाथ में थी, पिस्तौल कमर पे थी,
गाड़िया फुकी थी, आँखे नशीली थी,
धक्का देते उनको, तो ओ भी जलते थे,
हम ना समझे थे बात इतनी सी  !!

होसला बुलंद था, इज्जत लुट रही थी,
गिराते एक-एक को, क्या जरूरत थी इशारों की,
हम ना समझे थे बात इतनी सी  !!

हिम्मत की गद्दारों ने, अमर ज्योति हाथ लगाने की,
काट देते उनके हाथ तो फरियाद किसी की भी ना होती,
हम ना समझे थे बात इतनी सी  !!

भूल गये ओ रमजान, भूल गये ओ इंसानियत,
घाट उतार देते एक-एक को,
अरे क्या जरूरत थी किसी को डरने की,
संगीन लाठी तो आपके ही हाथ में थी,
हम ना समझे थे बात इतनी सी  !!

हमला तो हमपे था, जनता देख रही थी,
खेलते गोलियों की होली तो,
जरूरत ना पड़ती, नवरात्रि में रावण जलाने की,
रमजान के साथ-साथ, दिवाली भी होती,
हम ना समझे थे बात इतनी सी  !!

सांप को दूध पिलाकर,
बात करते है हम भाई चारे की,
ख्वाब अमर जवानो के,
और जनता भी डरी-डरी सी,
हम ना समझे थे बात इतनी सी  !! 
--->> by- सुजाता पाटील  
पुलिस निरीक्षक,
मुंबई 

Thursday, July 11, 2013

जगननाथ मंदिर की कथा

                   
जगननाथ मन्दिर 
                    भगवान श्री जगननाथ पूरी चार परम धामों में एक धाम माना गया है। ऐसी मान्यता है की सतयुग में बदरीनाथ, त्रेता में रामेश्वरम, द्वापर में द्वारकापुरी, और कलयुग में श्रीजगन्नाथ पूरी ही पावनकारी धाम है। पहले यहां नीलांचल नामक पर्वत था और नीलमाधव की श्रीमूर्ति भी यहां इसी पर्वत में स्थापित थी। जिसकी देवता अराधना करते थे। यह पर्वत भिमी में चला गया और देवता मूर्ति अपने साथ ही ले गए। पर उनकी स्मृति में इस क्षेत्र को नीलांचल कहा जाता है। श्री जगननाथ मंदिर पर लगा चक्र नीलच्छ्त्र कहलाता है। जहां तक यह चक्र दिखाई देता है वहा तक श्रीजगन्नाथ पूरी है।
इस क्षेत्र के अनेक नाम है। इसे श्रीक्षेत्र ,पुरुषोत्तमपूरी और शंखक्षेत्र भी कहते है क्योकि इस पुरे पुण्य स्थल की आकृति शंख के समान है। शाक्त इसे उड्डीयन पीठ कहते है। कहा जाता है यहां सती माता का नाभि गिरा था।
उत्कल प्रदेश के प्रधान देवता श्री जगननाथ जी ही माने जाते हैं। राधा और श्रीकृष्ण की युगल मूर्ति के प्रतीक स्वयं श्री जगननाथ जी हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा इंद्रघुम्न भगवान जगननाथ को शबर राजा से यहां लेकर आये थे तथा उन्होंने ही मूल मंदिर का निर्माण कराया था जो बाद में नष्ट हो गया।
इस मूल मंदिर का कब निर्माण हुआ और यह कब नष्ट हो गया इस बारे में पक्के तौर पर कुछ भी स्पष्ट नही है। ययाति केशरी ने भी एक मंदिर का निर्माण कराया था। मौजूदा 65 मीटर ऊंचे मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में चोलगंगदेव तथा अनंगभीमदेव ने कराया था। परंतु जगननाथ संप्रदाय वैदिक काल से लेकर अब तक मौजूद है। मौजूदा मंदिर में भगवान जगननाथ की पूजा उनके भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा के साथ होती है। इन मूर्तियों के चरण नहीं है। केवल भगवान जगन्नाथ और बलभद्र के हाथ है लेकिन उनमें कलाई तथा ऊंगलियां नहीं हैं। ये मूर्तियां नीम की लकड़ी की बनी हुई है तथा इन्हें प्रत्येक बारह वर्ष में बदल दिया जाता है। इन मूर्तियों के बारे में अनेक मान्यताएं तथा लोककथाएं प्रचलित है। यह मंदिर 20 फीट ऊंची दीवार के परकोटे के भीतर है जिसमें अनेक छोटे-छोटे मंदिर है। मुख्य मंदिर के अलावा एक परंपरागत् डयोढ़ी, पवित्र देवस्थान या गर्भगृह, प्रार्थना करने का हॉल और स्तंभों वाला एक नृत्य हॉल है। सदियों से पुरी को अनेक नामों से जाना जाता है जैसे, नीलगिरि, नीलाद्री, नीलाचल, पुरूषोत्तम, शंखक्षेत्र, श्रीक्षेत्र, जगननाथ धाम और जगननाथ पुरी। .... by- प्रीति झा

Wednesday, July 10, 2013

जगननाथ मंदिर रथ महोत्सव


जगन्नाथ मन्दिर 


रथ यात्रा 
            जगननाथ पूरी मंदिर में रथ महोत्सव का सबसे ज्यादा महत्व यह है कि इससे भक्तजनों को अपने प्रिय आराध्य देव की एक झलक मिल जाती है। जैसे भगवान आम जनता से मिलने के लिए अपने मंदिर से बाहर आये हो। यह रथ महोत्सव बेहद लोकप्रिय हो गया है और इसने इतना महत्व प्राप्त कर लिया है कि अब यह केवल पुरी तक ही सीमित नहीं है।
भगवान जगन्नाथ तथा उनका रथ महोत्सव मिलन, एकता तथा अखंडता का प्रतीक है। यद्यपि वे पुरी में विराजमान हैं फिर भी वे इस संपूर्ण ब्रह्मांड के भगवान हैं तथा उनका प्रभावशाली चिताकर्षण सार्वभौमिक है। सभी लोग उनसे संबंधित हैं एवं वे सभी से संबंधित हैं। उनके विशाल नेत्रों के सामनें सभी बराबर हैं।
रथ यात्रा और नव कालेबाड़ा पुरी के प्रसिद्ध पर्व हैं। ये दोनों पर्व भगवान जगननाथ की मुख्य मूर्ति से संबद्ध हैं। नव कालेबाड़ा पर्व बहुत ही महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, तीनों मूर्तियों- भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का बाहरी रूप बदला जाता है। इन नए रूपों को विशेष रूप से सुगंधित चंदन-नीम के पेड़ों से निर्धारित कड़ी धार्मिक रीतियों के अनुसार सुगंधित किया जाता है। इस दौरान पूरे विधि-विधान और भव्य तरीके से लकड़ी को मंदिर में लाया जाता है।
इस दौरान विश्वकर्मा (लकड़ी के शिल्पी) 21 दिन और रात के लिए मंदिर में प्रवेश करते हैं और नितांत गोपनीय ढंग से मूर्तियों को अंतिम रूप देते हैं। इन नए आदर्श रूपों में से प्रत्येक मूर्ति के नए रूप में ब्रह्मा को प्रवेश कराने के बाद उसे मंदिर में रखा जाता है। यह कार्य भी पूर्ण धार्मिक विधि-विधान से किया जाता है।
भगवान श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथपुरी में आरंभ होती है। यह रथयात्रा पुरी का प्रधान पर्व भी है। इसमें भाग लेने के लिए, इसके दर्शन लाभ के लिए हज़ारों, लाखों की संख्या में बाल, वृद्ध, युवा, नारी देश के सुदूर प्रांतों से आते हैं। यहाँ की मूर्ति, स्थापत्य कला और समुद्र का मनोरम किनारा पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है। स्कंद पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि रथ-यात्रा में जो व्यक्ति श्री जगन्नाथ जी के नाम का कीर्तन करता हुआ गुंडीचा नगर तक जाता है वह पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। रथयात्रा एक ऐसा पर्व है जिसमें भगवान जगन्नाथ चलकर जनता के बीच आते हैं और उनके सुख दुख में सहभागी होते हैं।
यहां पर बारह महत्वपूर्ण त्यौहार मनाये जाते हैं। लेकिन इनमें सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार जिसने अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है वह रथयात्रा ही है। यह यात्रा आषाढ़ महीने (जून-जुलाई) मे आता है। भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र तथा बहन सुभद्रा के साथ गुडिचा मंदिर पर वार्षिक भ्रमण पर जाते है जो उनके एक सगे संबधी का घर है। ये तीनों देव वहां के लिए अपनी यात्रा सजे संवरे रथों पर सवार होकर करते हैं, इसीलिए इसे रथ यात्रा अथवा रथ महोत्सव कहते हैं। इन तीनों देवों के रथ अलग-अलग होते हैं जिन्हें उनके भक्त गुंडिचा मंदिर तक खींचते हैं। नंदीघोष नामक रथ 45.6 फीट ऊंचा है जिसमे भगवान जगन्नाथ सवार होते हैं। तालध्वज नामक रथ 45 फीट ऊंचा है जिसमे भगवान बलभद्र सवार होते हैं। दर्पदलन नामक रथ 44.6 फीट ऊंचा है जिसमे देवी सुभद्रा सवार होती है। ये रथ बड़े ही विशाल होते हैं तथा इन्हें रथ में सवार देव के सांकेतिक रंगों के अनुसार ही सजाया जाता है। देवों को लाने के लिए इन रथों को मंदिर के बाहर एक परंपरा के अनुसार ही खड़ा किया जाता जिसे पहंडी बीजे कहते हैं। गजपति स्वर्णिम झाडु से सफाई करता है। केवल तभी रथों की खींचा जाता है। ये तीनों देव गुंडिचा मंदिर में सात दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर इसी तरह से उन्हें वापस उनके मुख्य मंदिर में लाया जाता है। इस प्रकार नौ दिनों तक चलने वाला यह रथ महोत्सव समाप्त होता है। यह अनोंखा रथ महोत्सव कब से शुरू हुआ किसी को पता नहीं है। जबकि रथ शब्द ऋंगवेद तथा अथर्ववेद में भी आया है तथा भगवान सूर्य का रथ पर सवार होने को भी पौराणिक कथाओं में वर्णित है। by- Jagran News 

Monday, July 8, 2013

पढो तो एसे पढो भाग - 5



1- पढने की शुरुआत अपनी रूचि के विषय से करे !

2- हमारे मस्तिष्क का यह कैनवास जितना साफ- सुथरा होगा, उस पर उकेरे जाने वाले चित्र भी उतने ही        
    अधिक गहरे, चटकदार और स्पष्ट होगे !

3- आप अपने मस्तिष्क को जटिलताओ से अधिक से अधिक मुक्त रखे !

4- मस्तिष्क की क्षमता सीमाओ से परे है वह कुछ भी कर सकता है और कितना भी कर सकता है !

5- हमे प्रकृति ने मस्तिष्क रूपी जो यह अदभुत यंत्र दिया है, उसके जैसा विलक्षण अभी तक दूसरा कोई यंत्र      
     नहीं बन सका है !

6- जीनियस वह है, जो सही बात का सही वक्त पर सही तरीके से प्रयोग कर सके !

7- प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती, बल्कि सच तो यह है कि वह प्रतिकूल परिस्थितियों में अधिक
     निखरती है !

8- जब हम क्रोध में होते है, तो हमारा मस्तिष्क कुछ अलग तरह की तरंगो से भर जाता है !

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