Saturday, October 26, 2013

शायरी



जिनकी खातिर जीने के सारे वसूल ही बदल दिए !
वो आज हमें जीने का तरीका सिखा रहे है !
कसमे तो खायी थी साथ चलने को !
पर न जाने क्यों अनजान राहों पे छोड़ के चल दिए !!

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Friday, October 25, 2013

शायरी





हे आशकी के परिंदों, जरा समल के दिल लगाना !


यहा चेहरे लगा कर चलने वाले बहुत है !!




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Thursday, October 24, 2013

देशभक्ति शायरी




चल पड़े है इन जुलुस में एक नया कारवा ले के ...

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Wednesday, October 23, 2013

सायरी




हर रोज बैठा रहा उसी घाट पे तेरे इंतजार में !


और तुम कहती हो कि तुम मुझे याद करना भूल गये !!










ओ मेरे कुछ कहने पे महफिल से रूठ के चल दिए !
दिल तो किया उनकी बाहों को पकड़ के रोक ले, 
पर क्या करे मजबूर थे,
उस महफिल में जो ये गवारा न था !!



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शायरी





बस चाहत यही है की हम जी ले जी भर के 

पर कम्बख्त साथ चलने वाला जो कोई न था !!!!

शायरी





अगर मै जानता वो वेवफा निकलेगी !

तो मै इस कदर उसके लिए दीवाना न हुआ होता !!





बस चाहत यही है की हम जी ले जी भर के 

पर कम्बख्त साथ चलने वाला जो कोई न था !!!!


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सांख्ययोग


वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌ ।

कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌ ॥

भावार्थ :   हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?॥21॥

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

भावार्थ :   जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है॥22॥

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥

भावार्थ :   इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता॥23॥

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥

भावार्थ :   क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है॥24॥

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥॥

भावार्थ :   यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे शोक करना उचित नहीं है॥25॥

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌ ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥

भावार्थ :   किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है॥26॥

जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥

भावार्थ :   क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है॥27॥

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥

भावार्थ :   हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?॥28॥

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌ ॥

भावार्थ :   कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता॥29॥

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥

भावार्थ :   हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य (जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है॥30॥

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Monday, October 21, 2013

यू तो मै सायर ना था पर तुम्हे देख कर सायरी लिखने की आदत पड़ गयी



यू तो मै सायर ना था पर तुम्हे देख कर सायरी लिखने की आदत पड़ गयी !
जब तुमने देखा दिवानगी भरी निगाहों से ,
उस रोज दिल तो चाहा देखता रहू बस तुम्हे ही ,
पर न जाने क्यों एक डर सा लग रहा था ,
और दिल कह रहा था बस एक कदम आगे तो बढ़ जाओ  !!

यू तो मै सायर ना था पर तुम्हे देख कर सायरी लिखने की आदत पड़ गयी !
तेरे लिए दीवाना था मै पहले ही दिन से ,
पर दिल लगी होनी बाकी थी ,
मै जनता हु तुभी मुझे चाहती थी ,
पर ये जमाने से तुम्हे डर था !!

यू तो मै सायर ना था पर तुम्हे देख कर सायरी लिखने की आदत पड़ गयी
अगर तुमको डर था इतना इस जमाने से ,
तो फिर क्यों इतनी दीवानगी भरी निगाहों से देखा ,
मै तो हर रोज जी रहा था मजे से ,
पर अब तेरी याद हर रोज सताने लगी है ,

यू तो मै सायर ना था पर तुम्हे देख कर सायरी लिखने की आदत पड़ गयी

Sunday, October 20, 2013

मेरी कलम

मेरी कलम ( My Pen )


                                       
                                                  मै गौरव पाण्डेय ( गौरव नाथ पाण्डेय ) ! मेरी कलम किसी से bound नहीं है मै केवल एक ही Subject पे नहीं लिखता मेरे सामने जो होता है बस मै  बस लिख देता हु जैसे एक कलाकार किसी को देख कर उसका Photo या जो भी उसके Mind में आया उसको एक Plane Paper पे Draw कर देता है बस उसी तरह मै भी हु ! मेरी कलम न ही किसी के डर से लिखना छोड़ेगी और न ही बिकेगी !

व्यक्तित्व ( Personality ) :-  मुझे हिन्दुत्व में जीना अच्छा लगता है ! हिन्दुत्वादी होने में एक गजब का                                                      एहसास होता है यैसा लगता है कि हा हम कुछ कर रहे है किसी के लिए ! यैसा लगता है कि मानो बस इसी के लिए पैदा हुए थे और ईश्वर ने हमे इसी के लिए भेजा है ! एक अच्छे से जीने का मक्सद मिल जाता है !
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Sunday, October 13, 2013

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येसा तो ना था



बारिश का सीजन आशिकी का सीजन, प्रेमीजन शहर में ठिकाने ढूंढते हैं- बात तो कर ही लें कायदे से। दिल्ली इस हिसाब से बहुत ठिकानाहीन शहर है। मुंबई में समंदर किनारे थोड़ी राहत नसीब हो जाती है, प्रेमीजनों को। दिल्ली में चोरों के सैलाब, डाकुओं के तूफान हैं, बस पानी का समंदर नहीं है। दिल्ली के नौजवान वोटरों का सही-सेट हिसाब लग जाए, तो नेतागण यह भी प्रॉमिस कर देंगे नौजवानों से कि बहुत जल्दी समंदर ले आया जाएगा दिल्ली में। दिल्ली में प्रेम-संवाद बहुतै महंगा है। गरीब तो दूर, मध्यवर्गीय प्रेमी ठीकठाक से रेस्त्रां में तीन घंटे बैठने के बाद जेब में इत्ता बड़ा छेद महसूस करते हैं कि सोचते हैं कि हाय ना मिलते, तो बेहतर था, दिल पे तब जितना बड़ा छेद होता, वह जेब के छेद के मुकाबले बहुतै छोटा होता। दिल्ली में प्रेम धीमे-धीमे आलू, टमाटर जैसा होता जा रहा है, भ्रष्टाचारी ही अफोर्ड कर पाएंगे। प्रेमियों और भ्रष्टजनों में एक और खास समानता दिख रही है- दोनों ही सीसीटीवी कैमरों से खौफ खाते हैं। भ्रष्टों का अलबत्ता सीसीटीवी कैमरे कुछ ना बिगाड़ पाते, प्रेमीजनों का बिगड़ जाता है। मेट्रो में सफर करने वाले कई नौजवानों-युवतियों को जानने-मिलने वालों के इस खामोश सवाल का सामना करना पड़ा है कि हाय वो मेट्रो के सीसीटीवी कैमरे में प्रेमरत तुम ही तो ना थे। प्रेमियों को कई जवाब देने पड़ते हैं।
बारिश में कई प्रेमीजन निराश-परेशान घूम रहे हैं। मैंने सुझाव दिया है कि मेट्रो में अब तुम मुखौटे पहनकर जाया करो, बालक टॉम का पहन ले, बालिका जेरी का पहन ले। सीसीटीवी फुटेज देखकर लोग हैरान होंगे कि हाय बिल्ली चूहे को प्यार कैसे कर रही है। इश्क में सब कुछ संभव है, अपार संभावनाएं हैं इश्क में.
editorial

Friday, October 11, 2013

Bhagavad Gita Chapter



श्री कृष्णा काले रंग के क्यों है ?



श्रीकृष्ण को काले रंग का बताया है
ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीराम नीले रंग के थे वहीं शास्त्रों में श्रीकृष्ण को काले रंग का बताया है। यह सुनकर अक्सर हमारे मन में यह सवाल उठता है कि हमारे भगवानों के रंग-रूप इतने अलग क्यों हैं। भगवान कृष्ण का काला रंग तो फिर भी समझ में आता है लेकिन भगवान राम को नील वर्ण भी कहा जाता है। क्या वाकई भगवान राम नीले रंग के थे, किसी इंसान का नीला रंग कैसे हो सकता है? वहीं काले रंग के कृष्ण इतने आकर्षक कैसे थे? इन भगवानों के रंग-रूप के पीछे क्या रहस्य है। राम के नीले वर्ण और कृष्ण के काले रंग के पीछे एक दार्शनिक रहस्य है। भगवानों का यह रंग उनके व्यक्तित्व को दर्शाते हैं। दरअसल इसके पीछे भाव है कि भगवान का व्यक्तित्व अनंत है। उसकी कोई सीमा नहीं है, वे अनंत है। ये अनंतता का भाव हमें आकाश से मिलता है। आकाश की कोई सीमा नहीं है। वह अंतहीन है। राम और कृष्ण के रंग इसी आकाश की अनंतता के प्रतीक हैं। राम का जन्म दिन में हुआ था। दिन के समय का आकाश का रंग नीला होता है। इसी तरह कृष्ण का जन्म आधी रात के समय हुआ था और रात के समय आकाश का रंग काला प्रतीत होता है। दोनों ही परिस्थितियों में भगवान को हमारे ऋषि-मुनियों और विद्वानों ने आकाश के रंग से प्रतीकात्मक तरीके से दर्शाने के लिए है काले और नीले रंग का बताया है।

अगर आप श्रीमद भागवद गीता Facebook पे पढना चाहते है तो हमारे Page को Join कीजिये Post हिंदी And English में आप पढ़ सकते है Link ----> Srimad Bhagavad Gita

Saturday, October 5, 2013

काश सचमुच हो पाता



मुल्क तेरी बर्बादी के आसार
नज़र आते है ,
चोरों के संग पहरेदार
नज़र आते है

ये अंधेरा कैसे मिटे ,
तू ही बता ऐ आसमाँ ,
रोशनी के दुश्मन चौकीदार
नज़र आते है

हर गली में, हर सड़क पे,
मौन पड़ी है
ज़िंदगी,
हर जगह समसान से हालात
नज़र आते है

सत्ता से समझौता करके
बिक गयी है लेखनी,
ख़बरों को सिर्फ अब
बाज़ार नज़र आते है

सच का साथ देना भी बन
गया है जुर्म अब,
सच्चे ही आज गुनाहगार
नज़र आते है

देश की हिफाज़त सौंपी है
जिनके हाथों मे,
वे ही आज गद्दार
नज़र आते है

खंड खंड मे खंडित
भारत रो रहा है ज़ोरों से ,
हर जाति, हर धर्म के,
ठेकेदार नज़र आते हैँ ।

Tuesday, October 1, 2013

Lal Bahadur Shastri


 लाल बहादुर शास्त्री को सत सत नमन 
वन्देमातरम - वन्देमातरम 

Name - Lal Bahadur Shastri / लाल बहादुर शाश्त्री
Born - 2 October 1904Mughalsarai, Banaras, United Province, British India now Mughalsarai,                                 Chandauli, Uttar Pradesh, India
Died  11 January 1966 (aged 61)Tashkent, Uzbek SSR, Soviet Union
Nationality Indian
Profession  Politician, Activist
Achievement     2nd Prime Minister of India, देश को जय जवान जय किसान Jai Jawaan Jai Kisaan का नारा                          दिया.   Shastri was known for his honesty and humility throughout his life. He was the first                              person to be posthumously awarded the Bharat Ratna, and a memorial “Vijay Ghat” was                              built for him in Delhi.

हम सभी को अपने अपने क्षत्रों में उसी समर्पण , उसी उत्साह, और उसी संकल्प के साथ काम करना होगा जो रणभूमि में एक योद्धा को प्रेरित और उत्साहित करती है. और यह सिर्फ बोलना नहीं है, बल्कि वास्तविकता में कर के दिखाना है. ---- > लाल बहादुर शास्त्री

In English - We all have to work in our respective spheres with the same dedication, the same zeal and the same determination which inspired and motivated the warrior on the battle front. And this has to be shown not by mere words, but by actual deeds.
----->> Lal Bahadur Shastri